जन्माष्टमी विशेष : जानें, श्रीकृष्ण ने कैसे रिश्तों को सहेजा

जन्माष्टमी विशेष : जानें, श्रीकृष्ण ने कैसे रिश्तों को सहेजा

देश भर में कृष्ण जन्माष्टमी की धूम है। हर कोई नटखट नंद गोपाल के अलग-अलग रूपों की पूजा कर रहा है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं और इसी दिन विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने जन्म लिया। श्री कृष्ण के बाल्य काल के नटखट अंदाज और लीलाएं सबका मन मोह लेती हैं। मथुरा के साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में भगवान कृष्ण के मंदिर में जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।



वैसे तो श्री कृष्ण की हर उम्र की बाल लीलाओं का वर्णन हमारी पौराणिक कथाओं, ग्रंथों में वर्णित हैं। इसके अलावा हमारे देश के कई कवियों ने श्री कृष्ण के अलग-अलग उम्र की लीलाओं का वर्णन किया है। इनमें सूरदास, रसखान, मीराबाई, बिहारी जैसे कई प्रसिद्ध कवि हैं। कृष्ण का चरित्र वृहद है, जिसे समझना आसान नहीं है। कन्हैया ने इतना विशाल चरित्र मानव जीवन लेकर प्रस्तुत किया कि आज भी हम उसे जितना समझने का प्रयास करते हैं वह बड़ा होता जाता है। उनके उम्र का हर पड़ाव मानवजाति के लिए सीख है।
 
समय और अवसर के अनुसार बदली अपनी भूमिका 
श्रीकृष्ण ने समय और अवसर के अनुसार अपनी भूमिका और जिम्मेदारी की प्राथमिकता बदली। उन्होंने संदेश दिया कि मित्र वही है, जो कठिन से कठिन परिस्थिति में आपका साथ दे। आज भी सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। उन्होंने सीख दी कि मनुष्य को दूरदर्शी होना चाहिए। हर परिस्थि‍ति का आंकलन करना आना चाहिए। उन्होंने अनुशासन में जीने और वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने का मंत्र दिया। श्रीकृष्‍ण को सबसे बड़ा कूटनीतज्ञ भी माना जाता है। उन्होंने सिखाया परिस्थितियां विपरीत हों, तो कूटनीति का रास्‍ता अपनाएं। पांडवों का साथ हर मुश्किल वक्त में दिया। श्रीकृष्ण ने कर्म करना सिखाया। कान्हा ने प्रेम को पवित्रता से निभाया। उन्होंने शिशुपाल को 100 बार क्षमा किया, लेकिन उसके नहीं सुधरने पर उसे मृत्यदंड दिया। राधा के साथ उनका प्रेम जीवात्मा का परमात्मा से मिलन कहा जाता है, जो आज भी एक साथ याद किए जाते हैं।
 
वैसे तो हम सभी बचपन से ही कहानियों, किताबों और टीवी या फिल्मों के माध्यम से श्री कृष्ण के अलग-अलग लीलाओं और रुपों से परिचित होते रहे हैं। लेकिन आज हम उनके कुछ प्रमुख अवतारों के बारे में नजर डालेंगे।
 
कारागार में भगवान श्री कृष्ण का जन्म


श्री कृष्ण का जन्म उनके ही मामा के कारागार में हुआ था। दरअसल कंस की बहन देवकी थी, जिनका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय जब वो अपनी बहन को लेकर जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई की देवकी और वासुदेव की आठवी संतान कंस की मृत्यु का कारण बनेगा। इससे कंस बहुत घबरा गया और उसने अपनी बहन और उसके पति वासुदेव को जंजीरों में जकड़ कर कारागार में डाल दिया। इसके बाद वासुदेव और दवकी को एक-एक कर सात संताने हुई और कंस ने उन सबको मार दिया। आखिर में जब उनकी आठवीं संतान यानि कृष्ण का जन्म होने वाला था। उस समय भी कंस ने खास इंतजाम किया था। लेकिन प्रभु की लीला के आगे सारे पहरेदार खड़े-खड़े सो गए। कारगारों के दरवाजे अपने आप खुल गए। जिस समय कृष्ण जी जन्म के समय घनघोर वर्षा हो रही थी। चारो तरफ घना अंधकार छाया हुआ था। भगवान के निर्देशानुसार कृष्ण जी को रात में ही वासुदेव ने मथुरा के कारागार से गोकुल में उन्हे नंद बाबा के घर ले गए, जहां नन्द बाबा की पत्नी यशोदा को एक कन्या हुई थी। वासुदेव बालक कृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को अपने साथ ले गए।
 
कृष्ण की बाल लीला


भगवान श्री कृष्ण बचपन से ही नटखट थे, जितना वो नंद बाबा और यशोदा जी को परेशान करते थे, उतना ही वो गांव वालों को भी अपने नटखट अंदाज और लीलाओं से परेशान करते थे। कृष्ण जी अपने दोस्तों के साथ गांव वालों के माखन चुरा कर खा जाते थे। जिसके बाद गांव की महिलाएं और पुरूष कृष्ण की शिकायत लेकर पहुंच जाते थे। तब उन्हें अपनी मां की डांट खानी पड़ती थी। नन्हें कृष्ण को कोई नहीं जानता था कि वो भगवान हैं और यशोदा दी उनकी शिकायत पर उन्हें खूब मारती थीं और बालक कृष्ण उनकी मार का भरपूर आनंद उठाते थे। सूरदास ने इस बर बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है.…
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो,
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ।
 
कालिया नाग का वध


एक बार श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद खेल रहे थे और अचानक गेंद यमुना नदी नें चली गई। गेंद के डूबने पर सभी साथियों ने कृष्ण जी को गेंद निकाल कर लाने को कहा। जिसके बाद वो तुंरत कदम्ब के वृक्ष पर चढ़कर यमुना में कूद पड़े और फिर अपने भाई बलराम के साथ मिल कर नदी में जहरिले कालिया नाग का वध किया।
 
रासलीला


भगवान श्री कृष्ण के बचपन से ही कई साथी थे। लेकिन उनका गांव की गोपियों से भी खूब बनती, लेकिन राधा जी का उनसे एक खास रिश्ता था। राधा, कृष्ण के बंसी के धुनों में रमजाती थीं। वृंदावन अपने गांव में राधा-कृष्ण ने खूब रासलीला की है यानि तीज त्योहार पर साथ नाचते बजाते थे। इतना ही नहीं कई बार कृष्ण तो अपने स्याम रंग और राधा के सफेद रंग को देखकर गुस्सा हो जाते और अपनी मां से पूछते – माँ वह राधा इतनी गोरी क्यों है, मैं क्यों काला हूँ? शिकायत करते हैं कि माँ मुझे दाऊ क्यों कहते हैं कि तू मेरी माँ नहीं है।

गोवर्धन पर्व


कृष्ण के लीला से अंजान एक बार भगवान इंद्र ने वृंदावन में खूब बारिश की, जिससे गांव वालों का सबकुछ उजड़ गया। पूरे गांव में पानी भर गया अब उनके पास कोई सहारा नहीं था। जब भगवान कृष्ण ने देखा, तो उन्होंने गांव के ही गोवर्धन पर्वत को अपनी कानी उंगली पर उठाकर सबकी सबको उसके नीचे छुपने की शरण दी। दरअसल गांव में तब इंद्र से डर कर उनकी पूजा करते थे। तब कृष्ण ने उन्हें परमेश्वर की पूजा करने की शिक्षा दी और फिर से नई शरूआत करने को कहा। साथ ही कार्तिक मास में अन्नकूट की पूजा आरंभ कराई।

कंस का वध 


कृष्ण और बलराम के अद्भुत पराक्रम को देख कर कंस समझ गया था कि ये देवकी और वासुदेव के ही पुत्र हैं और उन्हें मारने के कई उपाय किए लेकिन वो सभी में विफल रहा। आखिर में उसने तय किया कि इन बालकों को एक मायावी पहलवान के हाथों मरवा दे। इसके लिए कंस ने कृष्ण और बलराम को पहलवान से लड़ने के लिए आंमत्रित किया। लेकिन उन्होंने उस पहलवान को मार दिया और कंस का भी वध कर अपने जन्मदाता मां-बाब को कारागार से मुक्त कराया।

इसके बाद कृष्ण और बलराम शिक्षा के लिए अपने गुरू के आश्रम चले गए। कृष्ण ने कुछ दिन द्वारका में भी बिताए। इसके बाद कृष्ण के नेतृत्व में पांडवो ने कौरवों के साथ महाभारत का ऐतिहासिक युद्ध लड़ा। उसी दौरान उन्होंने अर्जुन को युद्ध, परिवार, कर्तव्य आदि पर ज्ञान दिया, जो कि श्रीमद्भागवत गीता में उल्लेखित है।
 

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